यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

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  अभिनंदन नववर्ष 2009 का !

>> Wednesday, December 31, 2008


वर्षांत का विदाई करें ,

आईये करें अभिनंदन वर्ष 2009 का ।

रचें रचना में जन के संघर्ष , अंतर्द्वंद्व को

आवाज़ दे बेआवाज़ को, सहारा दें बेसहारा को ।

शब्दों का ऐसा नगाड़ा बजायें कि जनतंत्र के उल्लू बिला जाये और रात

भी इतना जगजग कर दें कि फिर वह वापस हमारी दुनिया मे न आ पाये !

सभी पाठकों का हार्दिक अभिनंदन करता हूँ वर्ष 2009 में !

4 comments:

संजीव तिवारी December 31, 2008 at 5:43 PM  

अंग्रेजी नये वर्ष की शुभकामनायें ।

जितेन्द्र कुमार January 1, 2009 at 5:34 PM  

अंग्रेजी हो या हिन्दी.... वर्ष तो नया आ ही गया ना? सुन्दर ग्रिटिंग्स ।

धन्यवाद।

अविनाश वाचस्पति January 1, 2009 at 7:38 PM  

गुड कामनायें हमारी भी स्‍वीकार लें।

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