यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

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  कड़ी - [01] कविता ही क्यों-सुशील कुमार

>> Tuesday, December 2, 2008

नित्य बदलती इस दुनिया में जीवन विकास की पटरी पर चाहे कितना ही तेज क्यों न दौडे़, मनुष्य के अंतरतम में सौंदर्य-बोध और सुख-कामना की जो चिरकालीन , अदम्य प्यास लगी हुई है, वह कभी बदलती नहीं, न ही कम होती है । वह प्यास नैसर्गिक और व्यापक है । यही प्यास उससे बाहरी जगत में, और उसके आभ्यांतर में भी जो 'सु' है अर्थात सुन्दर है, उसको ढूंढवाती है । परंतु इस संसार में जो बाहरी सौंदर्य है,वह मनुष्य की सौंदर्य-कामना को पूर्ण नहीं कर पाता । संसार में हर जगह छ्ल-छ्द्म, ढोंग-प्रदर्शन, लूट-खसोट, दंभ-अहंकार और उत्पीड़न का कारोबार चल रहा है । ऐसे में सौंदर्य का कोई रास्ता नज़र नहीं आता । विकल्प बनते हैं भी तो टिक नहीं पाते, तब कविता ही इसका सही विकल्प बनती है क्योंकि इसके भीतर आत्मिक सौंदर्य का जो संसार रचा-बसा है,वह हमारे तन-मन को सुकुन देता है। वस्तुत: कविता हमारे भीतर एक ऐसा 'स्पेस' रचती है जहां हम विश्राम कर सकते हैं और थोडी़ देर ठहरकर सही दिशा में सोच भी सकते हैं । वह मन को सच्चाई के निकट लाती है , ऐसी सच्चाई जो व्यक्ति के आस-पास की दुनिया में प्राय: गोचर नहीं होती । वह बाज़ार के बाहर की जगह है और ध्यान देने की बात यह है कि ऐसी जगह लगातार छोटी होती जा रही है जो बाजार के बाहर हो और मनुज का निज एकांत हो ।

'रैप और पॉप' की इस चकाचौंध दुनिया में कविता की अनुगूंजें क्षीण होती जा रही है, पर इस क्षणिक कर्णप्रियता और मादकता के बीच , नहीं भूलना चाहिए कि कविता हमेशा के लिये है । इसलिये कविता की प्रासंगिकता सदैव बनी रहेगी और अपनी बात खुलकर कहती रहेगी क्योंकि कविता हर क्षण हमें मनुष्य बने रहने की सीख देती है।

कविता का स्वरुप ही सत्य की खोज और उसकी प्रतिष्ठा से बनती है । वह मनुष्य के जीवन और प्रकृति के भावपूर्ण संसार का लेखा-जोखा रखती है । संवेदनाओं के जगत का अगर कहीं सही हिसाब है तो कविताओं के यहां ! वह लोक-हृदय का सही पता बतलाती है ।

"कविता और साहित्य जिस भूमि पर काम करती है , वह जीवन के भावनात्मक सत्य के कोमल,कठोर, उर्वर, उदार और व्यापक पहलूओं से बनती है । हमारा यह संबंध और संघर्षमय संसार मनोंभावों और मनोविकारों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं से ही अपना रुप ग्रहण करता है जिसमें कविता का हस्तक्षेप सत्य के स्तर पर होता है । वह राजसी और तामसी मनोभावों से टकराती हुई सात्विकता का निर्देश करती है । " -अगर कविता के विज्ञ समालोचक डा. जीवन सिंह के इस विचार का कोई मंथन करे तो वह कविताओं के सहज स्वरुप, उसकी प्रकृति और मानव-मन से उसकी अंतरंगता के कारण को साफ़-साफ़ समझ जायेगा । संभवत: यही वह कारक है जिसके चलते कठिन से कठिन समय में भी कविता जीवित और जीवंत रहेगी और सतत उत्तर-आधुनिक हो रही पीढ़ियों की मनुष्यता को सभ्यता की कुरुपता और विरुपण से बचा पायेंगी क्योंकि पश्चिम से जो विचार और व्यवहार, विकास - गतिशीलता और उदारीकरण के मुखौटे ओढे़ हमारी संस्कृति की दहलीज लांघकर हममें समा रहे हैं , उनमें नव-उपनिवेशवाद की 'बू' है जो हमारी देशज और प्राकृतिक विरासत को नष्ट कर देने पर तुला है ,( इन नष्टप्राय होती चीजों में कविता भी शामिल है ) और एक गुलामी से निकलकर दूसरे गुलामी की ओर हमारे गमन का मार्ग खोल रहा है क्योंकि वे आदमी के काव्यात्मक तरीके से सोचने की संपूर्ण प्रक्रिया को ही उजाड़ देना चाहते हैं।

अस्तु,कविता हमेशा इस संवेदनहीनता के विरोध में खडी़ है । वह इस जीवन के समानांतर एक अलग , विलक्षण और सुंदर संसार रचती है जिसमें विचारों को बचाने की, जीवन की अच्छाईयों को अक्षुण्ण रखने की ताक़त है जो उन शब्दों से ग्रहण करती है जो समाज के श्रमशील -पवित्र श्वांसों से निस्सरित होता है , सक्रिय होकर सच्चाई को प्रतिष्ठित करता है और मनुष्यता की संस्कृति रचता है। झूठ को जीवन से विलगाता है एवं अन्याय,शोषण और उत्पीड़न से प्रतिवाद करता है। इसलिये अत्यंत दुरुह और जटिल होते इस समय में कोई बच सका तो थोडा़-सा वही बच पायेगा जो उस मन और हृदय के साथ हो जिसमें कविता के लिये भी थोडी़ - सी जगह अशेष हो ।

कविता में सबसे बडी़ शक्ति है व्यंजना की, उन ध्वनियों की जो कविता में प्रयुक्त शब्दों में अंतर्निहित होती है । यह ताक़त तो साहित्य की अन्य विधाओं के पास भी नहीं है । वैसे विधाओं में आपसी मतभेद नहीं होता । फ़िर भी मानव जीवन में कविता के शब्दकर्म की उपादेयता स्वयंसिद्ध है । ***

20 comments:

anshu December 2, 2008 at 4:26 PM  

This article is an eye opener.

अशोक कुमार पाण्डेय December 7, 2008 at 9:37 AM  

बधाई बहुत सुन्दर ब्लॉग है.
कवितायेँ फुर्सत से पढ़कर उन पर टिप्पणी करूंगा.

09425787930

मोहिन्दर कुमार December 8, 2008 at 12:54 PM  

सुन्दर ब्लोग... पहली बार आया हूं अब आना जाना लगा रहेगा.

सुशील जी कुछ भी हो जाये.. कविता कभी नहीं मर सकती... जब तक संसार है... भाव रहेंगे और जब तक भाव रहेंगे किसी ने किसी रूप में प्रकट होंगें और यहीं कविता होगी..

Rajendra December 12, 2008 at 10:59 PM  

बहुत ही सुंदर ब्लॉग है आपका. बधाई.

संगीता पुरी December 14, 2008 at 11:36 AM  

बहुत सुंदर ...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

भगीरथ December 15, 2008 at 4:07 PM  

कविता में लय है, भाव है,विचार है ,सौ न्दर्य की खोज है, सो कविता तो रहेगी

bahadur patel December 21, 2008 at 7:22 PM  

bahut sundar banaya hai apane blog ko.apane kavita par jo likha hai vah bhi satik hai. badhai.

Suresh Chiplunkar December 23, 2008 at 9:04 PM  

हिन्दी चिठ्ठा विश्व में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं…

अशोक मधुप December 23, 2008 at 10:45 PM  

हिंदी लिखाड़ियों की दुनिया में आपका स्वागत। अच्छा लिखें। बढिया लिखे। हजारों शुभकामनांए।

प्रकाश बादल December 23, 2008 at 11:58 PM  

एक बढिया ब्लॉग, मैने आपके ब्लॉग का लिंक अपने ब्लॉग पर लगा दिया है ताकि ये और भी पाठकों तक भी जा सके, और सभी को साहित्य की जानकारी मिले।

Amit December 24, 2008 at 2:11 AM  

bahut he accha likha hai..aise he likhte rahe....

दिगम्बर नासवा December 24, 2008 at 11:19 AM  

कविता की सुंदर व्याख्या की है आपने,
कविता मन के उठते भावों की साँस लेती अभिव्यक्ति है

प्रदीप मानोरिया December 25, 2008 at 9:50 AM  

बहुत सुंदर वास्तव में अलग सी बात है | बधाई सुंदरजानकारी की प्रस्तुति के लिए आपका लिखने पढने की दुनिया में स्वागत है निरंतरता की चाहत है ... मेरे ब्लॉग पर पधारें

bahadur patel December 25, 2008 at 10:02 AM  

ashok kumar pandey ki prem kavita par apane bahut achchhi tippani di.
maja aa gaya.bas yahi kahane yahan aya tha. dhanywaad.

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" December 30, 2008 at 9:19 PM  

जितना सुन्दर आपका ब्लाग है, आपकी रचनाऎं भी उतनी ही सुन्दर है.
हिन्दी चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है.
खूब लिखें,अच्छा लिखें

sanjaygrover December 30, 2008 at 9:37 PM  

इधर से गुज़रा था सोचा सलाम करता चलूंऽऽऽऽऽऽऽ
(और बधाई भी देता चलूं...)
baqi blog padhne ke baad, fursat se...

प्रकाश बादल December 31, 2008 at 2:02 AM  

नव वर्ष की शुभकामनाओं के साथ आपका स्वागत है।

प्रदीप मानोरिया January 1, 2009 at 10:58 AM  

नव वर्ष मंगल मय हो
आपका सहित्य सृजन खूब पल्लिवित हो
प्रदीप मानोरिया
09425132060

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर January 2, 2009 at 8:42 AM  

हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

प्राइमरी का मास्टर का पीछा करें

Manoj Kumar Soni January 3, 2009 at 12:07 AM  

सच कहा है
बहुत ... बहुत .. बहुत अच्छा लिखा है
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है
टेम्पलेट अच्छा चुना है. थोडा टूल्स लगाकर सजा ले .
कृपया वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें .(हटाने के लिये देखे http://www.manojsoni.co.nr )
कृपया मेरा भी ब्लाग देखे और टिप्पणी दे
http://www.manojsoni.co.nr और http://www.lifeplan.co.nr

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