यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

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  कड़ी - [2] स्मृति में टिके हुये क्षण और सृजन-सुशील कुमार

>> Thursday, January 1, 2009

जैसे-जैसे हमारी वय पक रही है, हम महसूस कर रहे हैं कि हमारे जीवन का वसंत कहीं खोता जा रहा है। लगातार किन्हीं अज्ञात-सी चीज़ों से उलझते जा रहे हैं हम, जिससे हमारे हृदय की दुनिया सिकुड़ती जा रही है और स्मृतियों का दायरा फैलता जा रहा है। यानि कि हमारे हाथ से निरंतर वह समय फिसलता जा रहा है, जिसमें कभी आदमीयत की महक़ हुआ करती थी, प्रेम की अजस्त्र धारा प्रवहमान थी और निस्सीम आकाश- सी स्वतन्त्रता से हम कुलांचे भर रहे थे। कहाँ बिला गया हमारा बाल-मन, वह किशोरपन, वह युवा-जोश और अल्हड़पन ? जीवन के किस दुर्गम-अपरिचित खोह में समा गयीं वे अद्भूत, कीमती चीज़ें जिनके होने से हमारा हृदय-कमल हरदम खिला होता था? अगर उसकी ह्त्या कर दी गयी तो फिर हम क्यों ज़िन्दा हैं और कितना ज़िन्दा हैं...? आदमी बनने की जिम्मेवारियाँ और विकास के चक्करघिन्नी में धूमते हुये कोल्हु के बैल की तरह हमें जीने की आदत पड़ गयी है और हमारे उस बेलौसपन को इतना तोड़ दिया है कि अब वह समय की मुर्दागाड़ी में सजकर जीवनेतिहास की वस्तु मात्र बनकर रह गयी है। ...और काल के फ्रेम में स्मृतियों के कितने-कितने चित्र जड़ दिये गये हैं ! उसमें कुछ रंग तो चित्तप्रिय हैं, पर कुछ काईयाँ हैं। जीवन की अनगिनत मुद्राओं को अर्थ देती हुई, कुछ धूसर और उदास तो कुछ तेज और चटख़दार। कई तरह की आवाजे़ भी सुन रहा हूँ - कुछ बेसुरे और डरावने, कुछ मादक और कर्णप्रिय। पर खुशफ़हम इरादों की जो तस्वीर हमारे मन में बैठी हैं वह हमारे हृदय को बराबर आवाज़ दे रही हैं कि आओ, फिर से अपना रंग चुनो और उस रंग में रंग जाओ, फिर से हमें अपना लो, अपने जीवन में भर लो।

सचमुच हमारी-आपकी, सबकी स्मृतियों में कुछ क्षण अब भी नितांत अकेले और समय के खूँटों से सलीब पर टँगे पड़े हैं, क्या आप देख नहीं पा रहे कि उनमें कहीं हर्ष है, कहीं आतंक और आर्तनाद। पुकार है तो कहीं जिज्ञासा, कहीं सुख की बयार शीतल-सम बह रही है तो कही पीड़ा की लहरें निर्मम हिलोरें ले रही हैं।

यह कितनी व्यथा भरी बात है कि आदमी जितना वर्तमान में जीता है, उससे कई गुणा अधिक वह या तो अपने बीते समय में, या फिर अपने सपनों में.. अपने वादों में वास करता है और जीते हुये भी वर्तमान से अनुपस्थित रहता है! इस कारण उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने आसपास के कार्य-कारण जगत और घटनाओं के प्रति उतनी सजग और सचेत नहीं रह पातीं जितनी कि होनी चाहिये। क्या यह मजाकिया बात है कि उसकी जि़न्दगी का अधिकांश, भूत-भविष्य के एक ऐसे कालखंड के कल्पनालोक में बीत रहा है जहाँ वह जीते जी पहुँच ही नहीं सकता कभी ? मै तो कहूँगा कि यह जीवन रूपी प्रदान की गयी वस्तु का अपव्यय है क्योंकि इस तरह वह वर्तमान को ठीक रीति से जी नहीं पाता। क्षण का यदि कोई चिरनवीन तह है तो वह अब है जो चल रहा है और इसी में सब है। भूत और भविष्य तो सदैव हमें अपने विचारों के अमूर्तन-अँधेरे में ही धकेलता रहा है क्योंकि स्मृति के टिके हुये क्षणों में इतनी शक्ति होती है कि जब भी आदमी रिक्त बैठा होता तो उसका अवचेतन मन सक्रिय हो उठता है और झट उसे भूत-भविष्य के किसी- न- किसी विचार-क्रम से जोड़ देता है।इस तरह स्मृति के वे क्षण सजीव होकर वर्तमान के विरुद्ध उसके इर्द-गिर्द एक मायावी संसार की सृष्टि कर देते हैं।

यह अनुभव करने योग्य है कि जिस व्यक्ति के अंतर्मन में दु:ख और अवसाद की जितनी गहरी छाया दबी हुई होगी, मौक़ा पाकर उसका ज्वार उस व्यक्ति में उतना ही उफान से प्रकट होगा। स्मृति में धँसे ऐसे क्षण जीवनघाती होते हैं और हममें उन विचार-भावों को भरते हैं जिसकी परिणति विषाद और असफलता ही होती है।

ये क्षण सृजन के लिये भी उतने ही घातक हैं। कवि-लेखक-कलाकार के लिये उसका धरोहर उसका वर्तमान होता है क्योंकि यही वह समय है जहाँ वह अपने आस-पास की प्रकृति और जगत का सूक्ष्म निरीक्षण करता है। गौरतलब है कि भूत भी कभी वर्तमान ही होता है और यदि वह अपने समय में जीवित रहा तो भविष्य़ भी एक न एक दिन उसका वर्तमान ही बनेगा। पर जब वह निरंतर अपने वर्तमान के प्रति अन्यमनस्क-असावधान रहता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वह अपने उन अनुभवों के बहुमूल्य क्षणों को खोता चला जा रहा है जिसके उपयोग की उसकी अपनी रचना में कर पाने की एक संभावना शेष थी। फलस्वरूप उसका इन्द्रियबोध उतना प्रखर और वेगवान नहीं रह पाता और उसकी काव्य-सम्प्रेषणीयता भी प्रभावित होती है। सृजन में भावों की जगह विचारों का प्राबल्य होता है क्योंकि अनुभव की कमी उसे मात्र अपने अर्जित किताबी ज्ञान की ओर उन्मुख करता है और इसके लिये उसे अपने पेशानी पर बल डालना पड़ता है। पर सिर्फ़ शब्दों की जादूगिरी सृजन को बोझिल बना डालती है।

हमारी यादों की दुनिया कभी सम और स्थिर नहीं होती। वह समय और परिवेश से अपना सत्व ग्रहण करती है और बदलती रहती है। उसमें सुनहरे पलों की आहटें कम, हादसों का दौर अधिक होता है। यही इसकी प्रकृति है। साथ ही, एक साहित्यकार हमेशा प्रकृति और परिवेश के अंतर्द्वंद्व और संघर्ष से अपने वर्तमान को नवीकृत करने को सचेष्ट भी रहता है। इसलिये उसकी स्मृति में टिके हुये क्षण यदि उसके वर्तमान के साथ एकलय और एकरस नहीं हैं तो उसे अपनी रचना में जीवन और जन के अंतर्द्वंद्व और संघर्ष को रेखांकित करने में कठिनाईयाँ आयेंगी जिससे उसकी रचना समकाल के संवेग और ध्वनि को मुश्किल से ही पकड़ पायेगी, बल्कि यूँ कहें कि उसके कुछ तार उसकी पहुँच से बाहर रह जायेंगे। अत: इन बीते क्षणों को अपने सृजन का अभिष्ट बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि हम अपने बुरे और दु:ख के पलों को याद करने के बजाय उसकी प्रकृति-सत्ता पर अपना ध्यान केन्द्रित करें और उसकी अभिलक्षणा का मनोविश्लेषण कर उससे उपजे सकारात्मक सोच को अभिव्यक्ति का माध्यम बनायें।

तभी एक कवि-लेखक के लिये स्मृति में टिके हुये क्षण की सार्थकता सिद्ध होगी। इसे मै यहाँ एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूँ। एक विद्यार्थी है जो मेधावी है पर उसका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। इस कारण परीक्षा में उसके अंक वह नहीं आ पाते है जैसा उसने सोचा था क्योंकि परीक्षा की अवधि में ही वह बीमार पड़ गया और उसके कई पेपर खराब हो गये। यह अवसाद, हो सकता है उसकी स्मृति में कई सालों तक टिकी रह जाये जो उसके भविष्य़ लिये शुभसंकेत नहीं है। अगर अब वह अपने संस्मरण या अपनी कविता में सिर्फ़ अपनी असफलता का वर्णन ही करे और उसकी प्रकृति-सत्ता से आमुख होकर उसकी विवेचना न करे तो वह अपने दु:ख से उबर नहीं पायेगा जब तक कि काल के मरहम उसके घाव नहीं भर देते। इसलिये स्मृत-क्षणों के कार्य-कारण जगत की समुचित व्याख्या बेहद जरूरी है। यहाँ जीवन के अनुभव का खनिज दबा होता हैं जिसे उत्खनित कर उसको अपने सृजन का हिस्सा बनाना एक रचनाकार के रचना-कर्म का अभिप्राय भी है और चुनौती भी।

मध्यमवर्गीय कुंठा और संत्रास से रची कविताओं में इसका पक्ष अत्यंत दूर्बल होता है क्योंकि वहाँ कवि अपनी व्यथा से उबर नहीं पाता जो अंतत: उसे उस घेरे के अंदर ले आती है जहाँ विडंबना और तनाव-संत्रास को ही वह सृजन का अभिप्रेत समझने लगता है, जिसकी प्रतिच्छाया में सृजन का नुकसान होता है, उसके रूपाकार प्रभावित होते हैं,रचना की प्रभावन्विति कमज़ोर होती है और कभी-कभी कवि अपने मूल लक्ष्य से भटक भी जाता है।***

9 comments:

अविनाश वाचस्पति January 1, 2009 at 2:17 PM  

यह किसके बारे में लिखा है। कम से कम मेरे बारे में तो यह सच ही नहीं अपितु सच के करीब भी नहीं है। न तो मेरी वय ही पक रही है, न मैं पकने ही दूंगा। न मैं और न मेरा वसंत कहीं खोया है, न कभी खोयेगा क्‍योंकि मैं संत नगर में रहता हूं। संत नगर वाले का वसंत भला कैसे खो सकता है। मैं किसी अज्ञात चीज से बिल्‍कुल भी नहीं उलझ रहा हूं, न उलझ ही सकता हूं। रही हृदय की बात तो इस बारे में डॉक्‍टर ही बेहतर बतला सकते हैं। पर हृदय कितना ही सिकुड़ ले अगर वापिस फैलेगा नहीं तो आदमी गया। इसलिए जितना सिकुड़ रहा है हृदय, उतना ही वापिस फूल भी रहा है। इसलिए जीवन में फूलों की महक कायम है। और सदा रहेगी भी। कहीं कुछ नहीं फिसला है फिसला है तो सिर्फ पैन या पैंसिल जिससे हम लिखते रहे हैं और अब कीबोर्ड से लिख रहे हैं। बालमन भी यहीं पर है और बिल्‍कुल भी चीत्‍कार नहीं कर रहा है और न बिलबिला ही रहा है। सारा जोश बरकरार है इसीलिए तो कोई हमें प्रभु तो कोई महाप्रभु मानता है जबकि मैं खुद को कर्म और विचारों का पुजारी मानता हूं। और पुजारी ही बना रहना चाहता हूं। सारी कीमती चीजों से बेशकीमती मेरी हंसी मेरे पास सदा से कायम है और उसका विपुल भंडार है मेरे पास। जिसको मैं रोज बांट रहा हूं फिर भी यह अनमोल खजाना खाली नहीं हो रहा है और खाली होगा भी नहीं और न होना ही चाहिए। हम जिंदा हैं और जिंदा ही रहेंगे। दूसरों को जिंदगी का रस प्रदान करने के लिए। बेलौसपन भी बांकपन बनकर सदा साथ है। जीवन वर्तमान ही है वो कभी इतिहास नहीं बन सकता। जो उसे इतिहास या भविष्‍य में तलाश कर रहे हैं उनके संबंध में मैं कुछ भी नहीं कह सकता सिवाय इसके वर्त का मान ही वर्तमान है। इसमें नहीं अपमान है। सब पुराना भूल गया हूं। जो आज है वो भी जब कल होगा तो यह भी भूल जाऊंगा। कुछ भी साथ लेकर नहीं जाऊंगा। सिर्फ यादें छोड़ जाऊंगा, वो भी सिर्फ उनके लिए जो याद रखना चाहेंगे। नहीं तो जो वर्तमान में जीने वाले हैं उनको यादों की भी दरकार कहां पर है। सिर्फ विचार चाहिए, और वो वर्तमान के साथ ही जीवंत रूप में विद्यमान रहते हैं।

यह प्रतिक्रिया कैसी लगी, बिल्‍कुल मत बतलाना। क्‍योंकि यह अब अतीत है। वर्तमान अब कुछ और है। लिखा और भूल गया। नया लिखने चल गया। आखिर मैं हूं कीबोर्ड का खटरागी। यह राग मधुर है गधुर नहीं बंधु।
अविनाश वाचस्‍पति

जितेन्द्र कुमार January 1, 2009 at 5:26 PM  

यह सच है कि आदमी विकास के दौर में अन्य चीजों की तो खूब तरक्की कर चुका है, किन्तु आज भी उसकी तलाश जारी है। रही बात व्यक्ति के अपने विचारों की तो, अविनाश जी जैसे लोगों की कमी नहीं, जो मंच पर तो लम्बे-चौरे भाषन दे डालते हैं पर निचे उतरने के बाद पुछते हैं- सब ठीक रहा ना?

आलेख आत्मचिन्तन की ओर ले जाता है। आपने जिस चिज को महसुस किया उसको लिखा... मुझे अच्छी लगी। धन्यवाद।

अविनाश वाचस्पति January 1, 2009 at 7:33 PM  

जितेन्‍द्र जी मंच दिलवा दीजिए

आपका आभारी रहूंगा

फिर आप पर तो नहीं

पर पब्लिक पर जरूर भारी रहूंगा।

Ashok January 1, 2009 at 8:14 PM  
This comment has been removed by the author.
Ashok January 1, 2009 at 8:19 PM  

“पतझड़” में सुशील कुमार के संस्मरण की दूसरी कड़ी ‘स्मृति में टिके हुये क्षण और सृजन’ पढा़ ।संस्मरण बहुत ही महत्वपूर्ण और सारगर्भित है।एक लेखक को कैसे अपनी स्मृति में टिके हुये क्षण को सृजन का हिस्सा बनाना चाहिये और उसके लिये क्या-क्या सावधानियाँ बरतनी चाहिये,इसको बहुत ही स्पष्ट और सहजता से भाई सुशील जी ने अपने गहरे जीवनानुभवों से बताने की कोशिश की है।-अशोक सिंह,जनमत शोध संस्थान,दुमका।

अशोक कुमार पाण्डेय January 1, 2009 at 8:29 PM  

सुशील भाई
लेख से सहमति बनते बनते रह गयी।
भाई मध्यवर्गीय सन्त्रास कविता मे क्यो नही आना चाहिये? वो भी तब जब आप ऑर मै ही नही कविओ की बहुसन्ख्या मध्यवर्ग से आती है।

सुशील कुमार January 1, 2009 at 9:10 PM  

यह कहां लिखा गया कि संत्रास नहीं आना चाहिये कविता में। बात यही है कि स्मृति के उस क्षण को खंगाल कर सकारात्मक सोच के साथ उसकी प्रकृति-सत्ता के साथ एकात्म होकर कविता लिखी जानी चाहिये।

Bahadur Patel January 2, 2009 at 11:45 PM  

sushil ji aapane bahut achchha likha hai.bahut kuchh janane ko mila. badhai.

राजीव रंजन प्रसाद January 9, 2009 at 2:53 PM  

आदरणीय सुशील सर,

सबसे पहले तो आपकी साईट की खूबसूरती की प्रशंसा करना चाहूँगा, फिर यह अनुरोध करूंगा कि साईट का रजिस्ट्रेशन ब्ळोगवाणी चिट्ठाजगत तथा नारद जैसे एग्रीगेटर के साथ करा लें जिससे इसका प्रसार अधिकतम हो सके। मैं आगे से आपकी हर पोस्ट में उपस्थित रहूँगा।

***राजीव रंजन प्रसाद

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