यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

पतझड़ की सदस्यता लें ताकि नये पोस्ट की सूचना जा सकें:

ईमेल- पता भरें: -

हाल में पोस्ट की गयी कुछ आलेखों के लिंक -

‘पतझड़’ का प्रतीक-चिन्ह’ (LOGO) -

प त झ ड़

‘पतझड़’ का लोगो-लिंक बनाएँ :-

अनुवाद करें (Translator) -

English French German Spain Italian Dutch

Russian Portuguese Japanese Korean Arabic Chinese Simplified

  © सर्वाधिकार: सुशील कुमार,चलभाष: 09431310216

वापस उपर जायें: