यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

पतझड़ की सदस्यता लें ताकि नये पोस्ट की सूचना जा सकें:

ईमेल- पता भरें: -

  कड़ी- [४] अजन्मी कविता की कोख़ से जन्मी कविता: एक साक्षात्कार डा.रति सक्सेना से

>> Tuesday, May 12, 2009

डा.रति सक्सेना हिंदी की उन थोड़े से मूर्द्धन्य कवयित्रियों में से हैं जिनकी काव्य-रचना प्रक्रिया से गुजरते हुए मुझे यह भासमान होता है कि उन्होंने कविता की स्थापित क्लासिकी और वर्जनाओं पर अपना ध्यान ज्यादा केन्द्रित नहीं किया, बल्कि खुद की अपनी क्लासिकी विकसित की, अपने नये मुहावरे विकसित किये और समकालीन कविता में बिना लाग-लपेट के प्रवेश किया, जिस कारण हिंदी समालोचकों की दृष्टि उधर गयी नहीं, या कहें कि जब-तब वक्रदृष्टि ही रही। पर उसकी चिंता किये बिना वह निरंतर काव्य-वर्जनाओं के विरुद्ध कविता के नये प्रतिमान की तलाश में तल्लीन रही हैं।...और अब उनकी कृतियाँ न मात्र वैश्विक साहित्य से जुड़ रही हैं बल्कि भारत से भी बाहर उनकी अभिनव पहचान बन रही हैं। अब तक हिन्दी में उनकी चार ( माया महाठगिनी, अजन्मी कविता की कोख़ से जन्मी कविता, सपने देखता समुद्र और एक खिड़की आठ सलाखें), अंग्रेजी में दो, मलयालम में एक ( अनूदित ) और इतालवी में एक कविता-संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं । (हिन्दी में दो और कविता संग्रह तथा अंग्रेजी में एक कविता संग्रह शीघ्र प्रकाशन की प्रतीक्षारत
हैं।) देश की करीब-करीब सभी भाषाओं में रति सक्सेना की कविताएँ अनूदित हुईं हैं। कई कविताओं के अनुवाद अंग्रेजी में अन्य देशों की पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं। ईरान की Golestaneh नामक पत्रिका में रति सक्सेना की कविताओं और जीवन को लेकर एक विशेष अंक निकाला गया है। अंग्रेजी पत्रिका andwerve <http://www.andwerve.com/> में रति सक्सेना से विशेष भेंटवार्ता प्रकाशित की गई है। रति सक्सेना ने कविता और गद्य की 11 पुस्तकों का मलयालम से हिन्दी में अनुवाद भी किया है जिसके लिए उन्हें वर्ष 2000 में केन्द्र साहित्य अकादमी का अवार्ड मिला। मलयालम की महान कवयित्री बालामणियम्मा को केन्द्र में रख कर उन्होंने एक आलोचनात्मक पुस्तक भी लिखी - “बालामणियम्मा - काव्य कला और दर्शन”।

[रति सक्सेना का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है अथर्ववेद को आधार बना कर लिखी पुस्तक " ए सीड आफ माइण्ड‍ - ए फ्रेश अप्रोच टू अथर्ववेदिक स्टडी" जिसके लिए उन्हें “इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र" फेलोशिप मिली। रति सक्सेना की दो पुस्तकें अथर्ववेद के प्रेमगीत, जिनमें वेदों के अनजाने पक्ष को प्रस्तुत किया गया है, प्रकाशित एवं चर्चित हुई हैं।

आपको इटली के मोन्जा ( Monza) में छह महीने तक चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम Poesia presente 2009 in Monza में विशेष रूप से आमन्त्रित किया गया है, रोम में of Mediterranea Festival में विशेष कविता पाठ का भी आमन्त्रण मिला है। अभी आपको नोर्वे के Stavanger नोर्वे दिवस के उपलक्ष्य में कृत्या और भारतीय कविता पर बोलने के लिए भी आमंत्रित किया गया है।]
रति सक्सेना की आगामी पुस्तकें हैं-‍ यात्रा वृतांत - ‘चींटी के पर’( हिन्दी में), अय्यप्पा पणिक्कर पर (अंग्रेजी में) और कृत्या- चार कदम -(हिन्दी और अंग्रेजी में)

------------------------------


साक्षात्कार -
१) पतझड़: आपने अपनी पहली कविता कब लिखी? अगर उपलब्ध हो तो उनकी कुछ पंक्तियां या छोटी है तो पूरी कविता उद्धृत करें।

रति सक्सेना: सुशील जी, मैंने पहली कविता 19-20 बरस की उम्र में लिखी थी। लेकिन उस वक्त मैं यह नहीं जानती थी कि यह कविता है। शब्दों और कल्पनाओं से मेरी दोस्ती बहुत पहले से थी। वे मेरे चारों तरफ उड़ते थे, उनकी काली पीठ पर रंगीन कल्पनाएँ होती थी, मेरा अपना संसार था, जहाँ पर मेरी कल्पनाएँ और मेरे शब्द पेंगे भरते रहते थे। शब्दों से इस कदर दोस्ती थी कि हर खुदा अक्षर मुझे आकर्षित कर लेता था। यानी कि झाड़ू लगा रही हूँ, कोई कागज का टुकड़ा दिखा, जिस पर कुछ
शब्द हैं तो मैं धूल- कचरे की चिंता किए बिना आराम से पढ़ने बैठ जाती थी। पढ़ने के पागलपन की मेरे घर में खूब हँसी बनाई जाती थी। लेकिन कविता को खास-तौर से कब पढ़ा, यह याद नहीं है। पर आश्चर्य की बात यह है कि जो पहली अभिव्यक्ति कागज पर उतरी, वह कविता थी। हालाँकि तब मैं यह नहीं जानती थी कि यह कविता है.. पर लिखी तो कविता ही सबसे पहले...कभी- कभी मुझे लगता है कि मैं बेहद आलसी किस्म की हूँ, इसलिए कथा -कहानी छोड़ कविता लिखने लगी.. पर यह भी हो सकता है कि कथा- कहानी में जितनी अधिक गप्प हो, उतनी बेहतर होगी, पर कविता एक सच्चाई की अपेक्षा करती है... बहरहाल जो भी हो, मैंने बिना जाने बूझे भी कविता ही लिखी सबसे पहले।

मेरी पहली कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार थीं - इस उबलते कहकहों के बीच/ यह फैले हुए होंठ / कुछ सोचने को मजबूर हो जाते हैं/ कि यह हँसी है/या कोई चीत्कार अंधेरी-पथरीली चट्टानों के बीच/ प्रतिध्वनित हो उठी है....

२) पतझड़: कविता के बीज आपके मन में कब और कैसे गिरे? कैसे फलित हुए?

रति सक्सेना: यह बात तो मुझे मालूम नहीं, क्योंकि मैं हिन्दी साहित्य की छात्रा नहीं रही हूँ। संस्कृत पढ़ी, लेकिन साहित्य में रुचि नही थी। व्याकरण और वेद पर ज्यादा जोर था।घर में कविता का कोई भी माहौल नहीं था। किताबों से दोस्ती थी, लेकिन किस्से- कहानियों में मन ज्यादा रमता था। पर पता नहीं कैसे कविता के बीज मन में गिरे। बस जो लिखा तो कविता थी। हालाँकि मुझे साहि्त्यिक निबन्ध
लिखना भी अच्छा लगता है, और कुछ कहानियाँ भी लिखी। पर खुद ही प्रभावित नहीं हुई अपने
कथा-लेखन से, तो छोड़ दिया कथा- संसार..हाँ इतनी बात तो है कि अब कविता पढ़ना कहानी किस्से पढ़ने से ज्यादा अच्छा लगता है।

३) पतझड़: आपके लेखन की पृष्ठभूमि और आधार क्या है? किन कवियों ने आपको प्रभावित किया?

रति सक्सेना: मेरे लेखन की पृष्ठभूमि मेरा एकान्तवास हो सकता है, मैं बीस बरस की उम्र में केरल में आ गई ( विवाह के बाद)। मध्यम वर्ग के परिवार में इकलौते पुत्र की इकलौती पुत्रवधु होने के कारण घरेलू जिम्मेवारियाँ भी बेहद थी, और बन्धन की जकड़न पहले की अपेक्षा कुछ ज्यादा थी। पहली जरूरत थी, अपने चारों जमें मकड़जालों को निकाल फैंकना..तेरह बरस लम्बी काली रात के समान थे, उस वक्त भी लिखा, लेकिन डायरी में बन्द होता गया। अहिन्दी माहौल, पायदान के नीचे छिपी राजनीति, ना जाने क्या था, जो मन को कुछ सुनने-देखने और समझने दे रहा था। बाद में ये ही अनुभूतियाँ मेरी कविताओं में आई। इसलिए इस रात का भी असर माना जा सकता है। जैसे कि मैं कह सकती हूँ कि मेरे पास शब्दों के ढ़ेर रहते हैं। बहुत बहुत बातूनी हूँ मैं, अब इतने सारे शब्दों के साथ एकान्त वास करना हो तो कहिए क्या होगा? सारे शब्द बाजीगर की गेन्द की तरह चारों तरफ नाचने लगेंगे। तो बस उन शब्दों को साधने, अपनी कल्पनाओं को नीड़ देना ही मेरी कविता की जरूरत रही। जो समाज में कह नहीं पा रही थी, कविता ने उसके लिए राह बना दी। हिन्दी में तो मुक्तिबोध, धूमिल, नागार्जुन तो अच्छे लगे ही, पर मुझे मिलारेपा, ललद्यत, अक्का और मीरां ने भी प्रभावित किया, कबीर को पढ़ते मैं कभी नहीं थकती।
विदेशी कवियों में Yannis Ritsos अचंभित करते हैं। पंजाबी के पाश और मराठी के विंदा कारंदीकर बेहद पसन्द हैं। मलयालम में बालामणियम्मा और अय्यप्पा पणिक्कर ने मुझे प्रेरणा दी है। इन कवियों से यह सीखा कि कविता एक यज्ञ है, परिश्रम नहीं।

४) पतझड़: आपके लिखने का कारण- परिस्थितियाँ ?

रति सक्सेना: अकेलापन, बस और कुछ नहीं। मैं भीड़ में भी अकेलापन महसूस करती हूँ, ठहाके लगाते वक्त भी आँसू का स्वाद चखती हूँ। बाहर से बेहद बहिर्मुखी, पर भीतर एक अजीब किस्म का भीगा गोला रहता है, जो लगातार आलोड़ित करता रहता है। एक वक्त था कि मैं ईश्वर से यही शिकायत करती थी कि मैं आम औरतों जैसी छोटी-छोटी बातों में खुश क्यों नहीं हो पाती हूँ,क्यो मुझे कुछ ना कुछ बैचेन किये रहता है। लेकिन अब पता चला कि मेरी नियति कुछ और थी।

५) पतझड़: आपकी कविताओं का भाषाई शिल्प, कहने के ढंग और उसकी अंतर्वस्तु उत्तर-भारतीय कवयित्रियों से अलग है। अपने शिल्प और रचना प्रक्रिया के विषय में आप क्या कहना चाहेंगी?

रति सक्सेना: इस बारे में क्या कह सकती हूँ, यह हो सकता है कि मेरे वेद-पाठन ने मुझे अलग लेखन शैली दी हो, या फिर भीड़ से अलग-थलग होने के कारण प्रचलित मुहावरों का मुझ पर प्रभाव नहीं पड़ा। हाँ एक बात जरूर है कि मैंने अय्यपा पणिक्कर को कई बार यह कहते सुना कि कविता में जो मुहावरा चल रहा है, उससे हट कर कुछ करना ही कविता है। चलताऊ भाषा से परहेज करना चाहिए, शायद यह मुझे समझ आ गया हो। कभी- कभी अनजाने में कही गई बात मन मे बैठ जाती है। मैं कविता करती हूँ तो झूठ नहीं बोल सकती, पर सीधे-सीधे कह भी नहीं सकती.. तो मुहावरे का सहारा अनायास ही आ जाता है। जैसे कि मेरी एक कविता थी : भले घर की लडकियाँ -
भले घर की लडकियाँ
पतंगें नहीं उडाया करतीं
पतंगों में रंग होते हैं
रंगों में इच्छाएँ होती हैँ
इच्छाएँ डँस जाती हैँ
पतंगे कागजी होती हैँ
कागज फट जाते हैँ
देह अपवित्र बन जाती है
पतंगों में डोर होती है
डोर छूट जाती है
राह भटका देती है
पतंगों मे उड़ान होती है
बादलोँ से टकराहट होती है
नसें तड़का देती हैं
तभी तो ,
भले घर की लडकियाँ
पतंगें नहीं उडाया करतीं
अब यहाँ पर पतंग क्या है, रंग और कागज क्या है, हर कोई समझ सकता है । डोर का छूटना, राह भटकना नए मुहावरे नहीं हैं, पर पतंग के साथ नए अर्थ दे देते हैं। यदि इस कविता को मुहावरे का जामा न मिलता तो बेहद नंगई हो जाती। हाँ, मैं यह कहूँगी कि मैंने इन इन मुहावरों को खोजा नहीं। ये अपने-आप आ गए। इस कविता को मैंने अपने मन में किसी बिल्डिंग के कॉरीडोर में चलते हुए रचा, जैसे ही मन में आई, डायरी में नोट कर लिया। लेकिन यह बात मेरे दिल में 30-40 सालों से थी।
जयपुर में संक्रान्ति के दिन पतंगे उड़ाई जाती थी। माड़वारी परिवार की लड़कियों तक को पतंग उड़ाने की छूट थी। पर हमारे घर में छत पर जाने तक की छूट नहीं थी़। पिता जी इधर- उधर चहलकदमी करते पड़ोंस की छतों में लड़कियों को चढ़ा देख गुस्साते रहते, ... भले घर की लड़कियाँ इस तरह बेशरमी नहीं करती। इस कविता में भले घर की लड़कियाँ मुहावरा तो पिता से मिला, लेकिन बाकी सब कुछ मेरी घुटन थी। ऐसा कई जगह हुआ है। माँ पढ़ी-लिखी थीं, वे भी अच्छे मुहावरे, अच्छी भाषा का
प्रयोग करती थीं। इसलिये शायद यह सब विरासत में मिला ही हो।

६) पतझड़: हिन्दी साहित्य की गुटबाजियों और खेमेबाजियों से सृजन किस हद तक और कैसे प्रभावित हुआ है?

रति सक्सेना: इस बारे मे हम कुछ न कहें ही तो ज्यादा अच्छा है। ‘कृत्या’ की संपादिका होने के कारण मैं यह समझती हूँ कि हिन्दी में जितनी अच्छी रचनाएँ लिखी गई हैं, शायद ही किसी अन्य भाषा में हो। यहाँ जितने विद्वान है, शायद ही किसी अन्य प्रादेशिक बाषा में हो। लेकिन इस गुटबाजी ने हिन्दी को अपने से ही हरा दिया है। साहित्य अकादमी में कभी भी हिन्दी साहित्यकार ऊँचे पद पर नहीं बैठ पाया, किसी भी साहित्यिक पोस्ट (पद) पर किसी हिन्दी के विद्वान को पाना नहीं के बराबर है। एक अच्छी भाषा और समर्थ साहित्यकारों के होते हुए भी हिन्दी का ह्रास इसी गुटबाजी का परिणाम है।लेकिन मैं एक बात बताऊँ, यह गुटबाजी हमारी राष्ट्रीय धरोहर है ( हँसी)। मैंने पंजाबी भाषा में भी यह गुटबाजी देखी है, और बेहद क्रूर तरीके की। फिर भी यदि हम अपनी मानसिकता को बदलें तो शायद कुछ हो, पर मुझे भरोसा नहीं है। हमारी मानसिकता पूरी तरह से बदल जाए, इसकी संभावना तो फिलहाल दिखती नहीं।

७) पतझड़: अपनी वेब पत्रिका http://www.kritya.in/ की किन विशेषताओं का यहां उल्लेख करना चाहेंगी? ‘कृत्या’ के मुख्य लक्ष्य क्या हैं?

रति सक्सेना: कृत्या एक सांस्कृतिक संस्था की मुख पत्रिका है। जिस वक्त कृत्या निकाली गई
, उस वक्त भारत में वेबपत्रिका का चलन नहीं था, यह साहित्य की पहली पत्रिका थी एक तरह से जो भारत से निकली। उन दिनों पूर्णिमा जी की अनुभूति चल रही थी। उस वक्त साहित्यकारों ने मुझे साफ- साफ शब्दों में जताया था कि वेबपत्रिका का कोई भविष्य नहीं है, और यह पूर्णतया साहित्यिक नहीं हो सकती। मैंने अनेकों से फोन पर बात की तो सभी का कहना था कि वेब का साहित्य बेहद बेकार है, इसलिए उन्हें कोई रुचि नहीं। पर आज तो हर कोई वेब में छपना चाहता है। ‘कृत्या’ साहित्य के
मानदण्डों पर खरी उतरी। ‘कृत्या’ हमने हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में निकाला। क्योंकि हमारा उद्देश्य अनुवाद के माध्यम से अन्य भाषाओं की कविता को भी पाठकों के सम्मुख लाना था। हम अपनी भाषाओं के श्रेष्ठ कवियों को अंग्रेजी में प्रस्तुत करके विश्व में भारतीय कविता की पहचान बनाना चाहते थे, और अन्य देशी और विदेशी कविताओं के जरिये अपने पाठकों को कविता के अलग-अलग रूपों से परिचित भी करवाना चाहते थे़ । ‘कृत्या’ के कवितोत्सव भी बेहद सफल रहे हैं और भारतीय कविता
को वैश्विक साहित्य में स्थान मिलने लगा है। ‘कृत्या’ को निकालने अन्य कारण यह भी था कि दक्षिण से कोई साहित्यिक पत्रिका नहीं निकल रही थी। मैं इस कमी को भरना चाहती थी।प्रिन्ट पत्रिका महंगी पड़ती है और लोगों की सहायता की जरूरत पड़ती है, जो मुझे मिल नहीं सकती थी। इसलिए नेट-पत्रिका निकाली। नेट-पत्रिका की पहुँच होती है। केन्द्र के विकेन्द्रीकरण के लिए इस तरह के प्रयास जरूरी हैं। अब तो अनेक पत्रिकाएँ है, और बेहद अच्छी हैं। मुझे यह देखकर खुशी होती है।

८) पतझड़: वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के इस दौर में कविता किस तरह प्रभावित हो रही है? क्या इस बयार का थमना संभव है ?

रति सक्सेना: हाँ, इस वक्त केवल एक चीज है जो बिकाऊ नहीं है।वह कविता है। यह अच्छा भी है और कुछ हद तक दु:खदायक भी। अच्छा इसलिए कि बिकाउ न होने के कारण कविता आज भी विश्वसनीयता रखती है, पर बिकाऊ न होने के कारण इस विधा का महत्व कम से कमतर होता जा रहा है। इस बयार का रुकना संभव तो नहीं लग रहा है। पर हमे निराश नहीं होना चाहिए।

९) पतझड़: इस कठिन समय में हिंदी कविता का क्या भविष्य है ? जरा विस्तार से।

रति सक्सेना: आप विस्तार की बात कह रहे हैं, मैं तो कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं हूँ। कुछ समझ में नहीं आता, पर मैं बेहद निराश नहीं हूँ; हिन्दी कविता में शक्ति है, और यही शक्ति मरने नहीं देगी।

१०) पतझड़: इधर साहित्य के कुछ हलकों से यह आवाज़ दी जा रही है कि यह समय कविता से मुक्त होने का समय है। इस पर आपकी क्या राय है ?

रति सक्सेना: होने दीजिए उन्हें। जो मुक्त होना चाहते हैं, कविता दर्शन की ही नहीं विज्ञान की भी जननी है, आप जानते ही होंगे। कल्पना ही तथ्य का कारण बनती है, कविता कल्पना को पहचान देती है और यह पहचान सही कारण जानने की इच्छा के कारण किसी नए तथ्य को जन्म दे देती है, वही विज्ञान कहलाता है। जब विज्ञान कविता से मुक्त नहीं हो पाया तो और कौन हो पाएगा! आर्यभट्ट की आर्यभट्टीयम में काव्य-तत्व विज्ञान-तत्व से कभी भी हलका नहीं हो पाया। चरक, सुश्रुत आदि भी अपनी बात कविता में ही कह पाए। दरअसल कविता जेहन में टंग जाती है, बेहद छोटी सी जगह में सिमट जाती है, कई भावों को सोख लेती है, इसलिए यह हमारे सबसे करीब होती है। कृत्या में अनेक साहित्य से इतर क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की कविताएँ आती हैं, सभी अच्छा लिखते हों, जरूरी नहीं। पर कविता में अभिव्यक्ततो करते हैं। कविता से मुक्ति संभव ही नहीं, क्योंकि यह बन्धन नहीं बल्कि स्वयं मे मुक्ति हैं।

११) पतझड़: कविता के धीरे-धीरे जनविमुख होने के आपके विचार से क्या -क्या करण हो सकते है? कविता में अतिशय गद्यात्मकता और लद्धड़ गद्य की बढ़ती प्रवृति पर आपके क्या सुविचार है?

रति सक्सेना: जी हाँ कविता जनविमुख होती जा रही है, दरअसल हम और हमारे समय का समाज ही जनविमुख होता जा रहा है़ आपसी विश्वास की कमी, धोखेधड़ी, चालाकी आदि हम सब पर हावी होते जा रहे हैं, आदमी अलग- थलग पड़ता जा रहा है। कोई किसी के बारे में सोचना भी नहीं चाहता। सम्बन्धों के अर्थ बदल गए हैं, स्वतन्त्रता की परिभाषा भी। स्वार्थ की सीमारेखा बढ़ गई है । कविता तो सच बोलती है.. तो वह इस समय में झूठ कैसे बोलेगी? कवि अपने आप से बात करने लगा है।
कोई है ही नहीं जिससे बतियाया जाए.. फिर कविता जनविमुख क्यों नहीं होगी! दूसरे के दर्द को समझे बिना, सहयोग की भावना के बिना जनभावना के साथ चलना संभव ही नहीं। सह-अनुभूति की जरूरत है सहानुभूति की नहीं, वह तो समाज से ही आएगी ना!

१२) पतझड़: आपकी नज़र में एक अच्छी कविता के क्या गुण होने चाहिये?

रति सक्सेना: भई! इतनी विद्वान नहीं हूँ मैं कि कविता की व्याख्या करने लगूँ। बस इतना कहना चाहूंगी कि कविता जोर-जबरदस्ती से नहीं आती, इसमें ईमानदारी होनी
चाहिए.. कर्म से कथन तक... शायद मैं कुछ ज्यादा कह गई...पर कहाँ है ईमानदारी आज के समाज में...?
१३) पतझड़: इस साक्षात्कार के माध्यम से आप नवोदित कवियों को क्या संदेश देना चाहेंगी?

रति सक्सेना: जो करना चाहते हैं, करते रहे, सुधार की हमेशा गुंजाइश होती है। पर उसके लिए शॉर्टकट मत अपनाइये, हमेशा कुछ नए अन्दाज में कुछ नया कहने की कोशिश करना हमे आगे बढ़ाता है। वही लिखिए जो आप महसूस कर रहे हैं, नकल करके कहीं नहीं पहुँचा जा सकता है।

१४) पतझड़: आपकी कोई छोटी कविता-
रति सक्सेना:
समुद्र के सपनों में मछलियाँ नहीं
सीप घोंघे जलीय जीव जन्तु नहीं
किश्तियाँ और जहाज़ नहीं
जहाज़ों की मस्तूल नहीं
लहरों का उठना और सिर पटकना नहीं
नदियाँ नहीं उनकी मस्तियाँ नहीं
समुद्र सपना देखता है
ज़मीन का उस पर चढ़े पहाडों का
पहाड़ों पर पेड़ों का
उन सबका जिन्हें नदियाँ छोड़
चली आईं थीं उसके पास
समुद्र के सपने में पानी नहीं होता है।
(-कविता/‘सपने देखता समुद्र’ से) ***

16 comments:

vandana May 12, 2009 at 5:15 PM  

sushil ji
pahli baar aapke blog par aayi hun aur is par rati saxena ji ke bare mein jankar dil khush ho gaya.........pahli baar unke bare mein jana.
bahut hi gahra aur bhavpoorna likhti hain.ab to unko padhne ki lalsa dil mein jagrit ho gayi hai.
shukriya aapne unke baare mein itni mahatvapoorna jankari di.

संगीता पुरी May 12, 2009 at 5:30 PM  

बहुत अच्‍छा लगा रति सक्‍सेना जी का परिचय .. शायद अभी तक उन्‍हें नहीं पढा था .. उनकी कविताएं भी दिल को छू गयी .. आपका बहुत बहुत धन्‍यवाद।

हिमांशु । Himanshu May 12, 2009 at 5:52 PM  

अत्यन्त जीवन्त साक्षात्कार । जिस पहली कविता का जिक्र रति जी ने किया है वही उनकी काव्यात्मक सामर्थ्य का परिचय करने के लिये पर्याप्त है । आभार ।

दिगम्बर नासवा May 12, 2009 at 6:48 PM  

रति जी का परिचय जान कर अच्छा लगा...........
भले घर की लडकियां............गहरी और भाव पूर्ण प्रभावी रचना लगी.......
दिल के करीब ही नज़र आती हैं उनकी कवितायेँ

Nirmla Kapila May 12, 2009 at 7:33 PM  

rati saxwna ji ka sakshatkar bahu badiya laga rati ji ko hardik badhai aur shubhkamnaye apka bhiabhar

सागर नाहर May 12, 2009 at 7:38 PM  

रतिजी से तो मेरा नेह का नाता है, पिछल चार सालों से परिचय है,हां कुछ समय से बात नहीं हो पाती।
कवितायें में ज्यादा नहीं पढ़ता पर रतिजी की कविताओं का मैं शुरु से प्रशंसक हूं।
भले घर की लड़कियां वाली कविता पढ़ कर तो हर कोई उनका फैन हो जायेगा।
रतिजी का साक्षात्कार पढ़वाने के लिये आपका बहुत बहुत धन्यवाद सुशीलजी।

M.A.Sharma "सेहर" May 12, 2009 at 8:44 PM  

बहुत ख़ुशी हुई रति सक्सेना जी से मिलकर.

उनके सुन्दर विचारों के साथ..

भले घर के लड़कियाँ ....अद्भुत भावपूर्ण रचना है
सादर !!!

vijay gaur/विजय गौड़ May 12, 2009 at 10:17 PM  

रति सक्‍सेना जी के बारे में जानना अच्छा लगा। उनकी बातों में एक खास किस्म की सादगी दिखाई दी जिसमें हिन्दी कविता का उजलापन घुला हुआ है। अच्छा लगा पढना।

PRAN SHARMA May 12, 2009 at 11:22 PM  

SUSHEEL JEE,
Dr.RATI SAXENA SE AAPKA
SANVAAD ROCHAK HEE NAHIN,BALKI
GYAANVARDHAK BHEE HAI.RATI JEE KA
HAR PRASHN KAA UTTAR PATHAK KO
SOCHNE PAR PRERIT KARTAA HAI.UNKAA
HINDI SAHITYA,VISHESHKAR KAVITA
KE PRATI YOGDAAN SARAAHNIY HAI.
UMDA SANVAAD KE LIYE AAPKO
DHERON BADHAAEEYAN.

Harkirat Haqeer May 13, 2009 at 12:42 AM  

रति जी का परिचय जान कर अच्छा लगा.......!!

काफी उम्दा लिखतीं है ....आपका शुक्रिया रति जो पढ़वाने के लिए ...!!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` May 13, 2009 at 3:26 AM  

रति जी और कृत्या हिन्दी साहित्य को समृध्ध करने मेँ अविस्मरणीय योगदान दे रहे हैँ और आज के इस, नेट के युग मेँ , इन्सान कहीँ भी रहे,
विचारोँ को उजागर कर वह विश्व की दूसरी भाषाओँ के बोलनेवालोँ से भी नेह ~ नाता, जोडने मेँ सफल हो जाता है ये सत्य सति जी के काव्य कू स्वागत करती इतालवी तथा अन्य भाषाओँ से सिध्ध हो रहा है . मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ रति जी को और आपका आभार, सुशीलजी।
... इस सार्थक साक्षात्कार को
प्रेषित करनेके लिये ..
- लावण्या

Udan Tashtari May 13, 2009 at 3:57 AM  

रति जी से संपर्क में रहा हूँ नेट के माध्यम से. आज आपके माध्यम से बहुत सारी जानकारी मिली, आभार.

Shefali Pande May 13, 2009 at 11:53 AM  

रति जी का साक्षात्कार पड़कर अच्छा लगा ...सुशील जी का धन्यवाद ,इसे हम लोगों तक पहुँचने के लिए ..

Kavyadhara May 27, 2009 at 12:23 PM  
This comment has been removed by a blog administrator.
ज्योति सिंह July 12, 2009 at 4:05 PM  

aapki rachana ke saath saath parichaya bhi prabhavshali hai ..umda .padhane aur aane se tassali mili .

श्यामल सुमन July 29, 2009 at 7:17 AM  

सुशील भाई - रति सक्सेना जी से इ-मेल पर मेरा सम्पर्क रहा है और कई बार उन्होंने कृत्या में मेरी रचनाओं को भी स्थान दिया है। पर सच तो यह है कि इससे अधिक उनसे मेरा परिचय नहीं था। आज आपके जीवंत साक्षात्कार के माध्यम से बहुत कुछ जान पाया हूँ। आपका शुक्रिया और रति सक्सेना जी के उज्वल भबिष्य की कामना के साथ-

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

हाल में पोस्ट की गयी कुछ आलेखों के लिंक -

‘पतझड़’ का प्रतीक-चिन्ह’ (LOGO) -

प त झ ड़

‘पतझड़’ का लोगो-लिंक बनाएँ :-

अनुवाद करें (Translator) -

English French German Spain Italian Dutch

Russian Portuguese Japanese Korean Arabic Chinese Simplified

  © सर्वाधिकार: सुशील कुमार,चलभाष: 09431310216

वापस उपर जायें: