यानि, पीले पत्ते शाखों से बेजान होकर झड़ पड़े हैं...
लौट आये हैं धरती पर वापस अपने अस्तित्व को माटी में
समाहित करने ...पर कोंपलें झूम रहीं अभी तरु-शिखाओं पर अपने
हश्र से बेख़बर उसे क्या पता कि जड़ें पाताल के अंधेरे में किस तरह लड़ रहीं ,
मर रहीं, सड़ रहीं, फिर भी धरती का सत्व-जल सोख दिन-रात उसे सींच रहीं, और बचा रहीं
पूरे जंगल का वजूद !
***लोकचेतना का गद्य-साहित्य और जन-बातों का अनवरत विचार-प्रवाह***

पतझड़ की सदस्यता लें ताकि नये पोस्ट की सूचना जा सकें:

ईमेल- पता भरें: -

  पतझड़ का नया कलेवर शीघ्र ही ...

>> Tuesday, September 1, 2009

पतझड़ का नया कलेवर शीघ्र ही ...
साथियों, इन दिनों ‘पतझड़’ पर काम चल रहा है। हो सकता है कि ब्लॉग खुलने में कुछ दिक्कतें आये पर ये अस्थायी दिक्कतें हैं। इनका परिहार कर लिया जायेगा और हम शीघ्र ही आपके समक्ष पतझड़ के नये रूप और उस पर नयी-नयी रचना लेकर आपकी सेवा में उपस्थित होंगे। असुविधा के लिये खेद है।

आपका, सुशील कुमार।

0 comments:

हाल में पोस्ट की गयी कुछ आलेखों के लिंक -

‘पतझड़’ का प्रतीक-चिन्ह’ (LOGO) -

प त झ ड़

‘पतझड़’ का लोगो-लिंक बनाएँ :-

अनुवाद करें (Translator) -

English French German Spain Italian Dutch

Russian Portuguese Japanese Korean Arabic Chinese Simplified

  © सर्वाधिकार: सुशील कुमार,चलभाष: 09431310216

वापस उपर जायें: